नई दिल्ली: भारतीय संसद का प्रश्नकाल अक्सर नीतिगत चर्चाओं का केंद्र होता है, लेकिन शुक्रवार को राज्यसभा में दृश्य कुछ अलग था। केरल में प्रस्तावित हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर को लेकर रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और CPI(M) सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। इस बहस ने न केवल केरल की रेल परियोजनाओं की स्थिति को उजागर किया, बल्कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच गहरे राजनीतिक मतभेदों को भी सतह पर ला दिया।
1. विवाद की जड़: मार्केटिंग बनाम हकीकत
बहस की शुरुआत तब हुई जब सांसद जॉन ब्रिटास ने रेल मंत्री की कार्यशैली पर कटाक्ष किया। ब्रिटास ने कहा कि अश्विनी वैष्णव “चीजों को दिखाने और उनकी मार्केटिंग करने” में माहिर हैं। उनका मुख्य तर्क यह था कि बजट में घोषित हाई-स्पीड कॉरिडोर की सूची से केरल को बाहर रखा गया है, जबकि मंत्री बार-बार पुराने सर्वेक्षणों (Surveys) का हवाला दे रहे हैं।
ब्रिटास का सवाल सीधा था—जब विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) पहले ही जमा की जा चुकी है, तो रेलवे बार-बार नए सर्वेक्षणों की बात क्यों कर रहा है? उन्होंने विशेष रूप से मेट्रो मैन ई. श्रीधरन के पत्र का जिक्र करते हुए पूछा कि क्या सरकार उन्हें इस प्रोजेक्ट के लिए अधिकृत करने जा रही है या सिर्फ समय बिता रही है।
2. अश्विनी वैष्णव का पलटवार: ‘कांग्रेस कम्युनिस्ट पार्टी’ पर प्रहार
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ब्रिटास की “मार्केटिंग” वाली टिप्पणी को अपमानजनक बताया और पलटवार करने में देरी नहीं की। उन्होंने केरल में सत्ताधारी LDF और विपक्षी UDF पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘कांग्रेस कम्युनिस्ट पार्टी’ करार दिया।
वैष्णव का आरोप था कि केंद्र सरकार ने केरल में रेलवे के विकास के लिए 1,900 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, लेकिन राज्य सरकार भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) में सहयोग नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि जब तक राज्य सरकार जमीन नहीं सौंपती, तब तक कोई भी प्रोजेक्ट कागजों से जमीन पर नहीं उतर सकता।
3. केरल हाई-स्पीड कॉरिडोर: तीन विकल्प और बड़ी चुनौतियां
रेल मंत्री ने सदन को बताया कि केरल के लिए वर्तमान में तीन तकनीकी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है:
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K-Rail (SilverLine) प्रोजेक्ट: यह केरल राज्य सरकार का प्रस्ताव है, जो तटबंध (Embankment) पर आधारित है। हालांकि, इसे पर्यावरण और विस्थापन संबंधी चिंताओं के कारण भारी विरोध का सामना करना पड़ा है।
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सतह आधारित कॉरिडोर: यह रेलवे द्वारा कराया गया सर्वेक्षण है, जिसमें ट्रैक जमीन की सतह पर बिछाए जाएंगे।
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एलिवेटेड कॉरिडोर (Elevated Corridor): मेट्रो मैन ई. श्रीधरन ने पूरे उत्तर-दक्षिण केरल में एक ऊंची (Elevated) लाइन बनाने का प्रस्ताव दिया है। वैष्णव के अनुसार, इसकी लागत लगभग 300 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर आएगी।
रेलवे अब इन तीनों में से सबसे ‘किफायती और बेहतरीन’ विकल्प की तलाश में है।
4. बजट 2026-27 और केरल की अनदेखी का आरोप
इस बहस के पीछे की एक बड़ी वजह केंद्रीय बजट 2026-27 भी है। बजट में सरकार ने देश में सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर विकसित करने की घोषणा की है, लेकिन इनमें केरल का कोई जिक्र नहीं है। केरल के सांसदों का तर्क है कि दक्षिण भारत के इस महत्वपूर्ण राज्य को हाई-स्पीड कनेक्टिविटी से वंचित रखना अन्यायपूर्ण है।
5. ई. श्रीधरन के प्रस्ताव का महत्व
डॉ. ई. श्रीधरन का प्रस्ताव इस पूरी बहस का केंद्र बिंदु बना हुआ है। श्रीधरन ने तर्क दिया है कि केरल जैसे घनी आबादी वाले राज्य में जमीन पर ट्रैक बिछाना बहुत मुश्किल और महंगा है, इसलिए एलिवेटेड लाइन ही एकमात्र व्यावहारिक समाधान है। रेल मंत्री ने संकेत दिए हैं कि वे जल्द ही श्रीधरन को चर्चा के लिए बुलाएंगे, जो केरल की जनता के लिए एक उम्मीद की किरण हो सकती है।
6. राजनीतिक गतिरोध और विकास की बलि
यह पहली बार नहीं है जब केरल की रेल परियोजनाएं राजनीति की भेंट चढ़ी हों। सबरी रेल लाइन का उदाहरण देते हुए अश्विनी वैष्णव ने कहा कि राज्य सरकार ने भारी दबाव के बाद ही इसके लिए काम शुरू किया। वहीं, विपक्ष का कहना है कि केंद्र सरकार राजनीतिक कारणों से गैर-भाजपा शासित राज्यों के साथ भेदभाव कर रही है।
7. निष्कर्ष: केरल के यात्रियों को कब मिलेगी रफ्तार?
संसद में हुई इस तीखी बहस से एक बात साफ है कि केरल के लिए हाई-स्पीड रेल का रास्ता अभी भी चुनौतियों भरा है। तकनीकी विकल्पों की तलाश और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच आम यात्री अभी भी पुरानी लाइनों और धीमी रफ्तार पर निर्भर है। यदि केंद्र और राज्य मिलकर भूमि अधिग्रहण और फंडिंग के मुद्दों को नहीं सुलझाते, तो ‘हाई-स्पीड’ का सपना फाइलों में ही दफन होकर रह जाएगा।







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