नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘प्रोटोकॉल उल्लंघन’ का मामला अब राष्ट्रपति भवन के दरवाजे तक पहुँच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने का औपचारिक समय मांगा है, लेकिन पार्टी का दावा है कि कई दिन बीत जाने के बाद भी उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब भाजपा और केंद्र सरकार, ममता बनर्जी सरकार पर राष्ट्रपति के अपमान का गंभीर आरोप लगा रही हैं।
1. सौगत रॉय का बड़ा दावा: “हमें समय क्यों नहीं दिया जा रहा?”
शुक्रवार को संसद परिसर के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए TMC के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने अपनी निराशा जाहिर की। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति को यह बताना चाहता है कि बंगाल सरकार ने आदिवासी समाज के उत्थान के लिए क्या-क्या ठोस कदम उठाए हैं।
सौगत रॉय ने कहा, “हमने 9 मार्च को ही पत्र लिखकर समय मांगा था, लेकिन 13 मार्च तक हमें राष्ट्रपति भवन से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।” गौरतलब है कि डेरेक ओ’ब्रायन ने इस संबंध में 12 से 15 सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल के लिए समय मांगा था।
2. विवाद की जड़: संथाल सम्मेलन और मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति
इस पूरे विवाद की शुरुआत 7 मार्च को हुई, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पश्चिम बंगाल की यात्रा पर थीं। एक संथाल सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति ने कुछ ऐसी बातें कहीं जिन्होंने ममता सरकार को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया:
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व्यवस्थाओं पर नाराजगी: राष्ट्रपति ने कार्यक्रम स्थल के चयन पर सवाल उठाया और कहा कि दूरदराज का इलाका होने के कारण कई आदिवासी भाई-बहन इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाए।
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नेताओं की अनुपस्थिति: राष्ट्रपति ने मंच से गौर किया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के कैबिनेट मंत्री इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे।
3. ममता बनर्जी की सफाई: “संघर्ष बड़ा है या प्रोटोकॉल?”
विपक्ष के हमलों के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी चुप्पी तोड़ी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कार्यक्रम सीधे राज्य सरकार या TMC द्वारा आयोजित नहीं किया गया था। उन्होंने अपनी अनुपस्थिति का कारण बताते हुए कहा कि वह उस समय केंद्र के खिलाफ एक धरने में शामिल थीं। ममता बनर्जी का तर्क था कि वह “जनता के हक की लड़ाई” लड़ रही थीं और उनका इरादा राष्ट्रपति का अपमान करना कतई नहीं था।
4. भाजपा का तीखा हमला: पीएम मोदी और जेपी नड्डा का मोर्चा
इस मुद्दे को भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर कहा कि बंगाल सरकार ने देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति के प्रति “घोर अनादर” दिखाया है। वहीं, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इसे महिला सशक्तिकरण के खिलाफ बताते हुए कहा कि एक महिला मुख्यमंत्री द्वारा एक महिला राष्ट्रपति का अपमान करना निंदनीय है।
5. TMC का ‘रिपोर्ट कार्ड’ दिखाने का प्रयास
राष्ट्रपति से मिलने की TMC की इस जल्दबाजी के पीछे एक सोची-समझी रणनीति है। पार्टी चाहती है कि वह राष्ट्रपति के सामने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए शुरू की गई योजनाओं का विवरण पेश करे।
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शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा: पत्र के अनुसार, TMC सरकार ने आदिवासियों के लिए बुनियादी ढांचे और विशेष छात्रवृत्ति योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं।
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सांस्कृतिक विकास: पार्टी यह साबित करना चाहती है कि उसकी नीतियां केवल कागजों पर नहीं बल्कि जमीन पर हैं।
6. विश्लेषण: आदिवासी वोट बैंक और 2026 की राह
पश्चिम बंगाल में आदिवासी (संथाल) समुदाय का वोट बैंक कई जिलों में निर्णायक भूमिका निभाता है। राष्ट्रपति मुर्मू खुद इसी समुदाय से आती हैं, ऐसे में उन पर की गई कोई भी टिप्पणी या प्रोटोकॉल में चूक TMC के लिए राजनीतिक रूप से महंगी साबित हो सकती है। यही कारण है कि ममता बनर्जी अब राष्ट्रपति से मिलकर अपनी छवि को सुधारने और डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश कर रही हैं।
7. निष्कर्ष: क्या राष्ट्रपति भवन से मिलेगा संदेश?
फिलहाल गेंद राष्ट्रपति भवन के पाले में है। क्या TMC के 15 सदस्यों वाले प्रतिनिधिमंडल को अपनी बात रखने का मौका मिलेगा? या फिर यह विवाद केंद्र और राज्य के बीच एक और ‘अवरोध’ बनकर खड़ा हो जाएगा? आने वाले कुछ दिन बंगाल की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं।







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